मायावती से दलितों का मोहभंग


मायावती के कार्यकाल में कई स्मारक बने हैं

लेकिन दलित समुदाय के लोग अपने जीवन स्तर में सुधार और सत्ता में भागीदारी दिलाने की दिशा में क़दम न उठाए जाने से काफ़ी मायूस
हो रहे हैं.

मायावती पिछले दो वर्षों से राजधानी लखनऊ में दलित महापुरुषों, अपने राजनीतिक गुरु कांशीराम और ख़ुद के नाम पर कई हज़ार करोड़
रुपयों की लागत से स्मारक, मूर्तियाँ, संग्रहालय और पार्क बनवाकर यह कह रही हैं कि इनसे दलितों का स्वाभिमान बढ़ेगा और लोग प्रेरणा
लेंगे.

उनका कहना है स्मारक समाज के ”वैचारिक सशक्तीकरण का एक माध्यम हैं” और उन्होंने जो स्मारक बनवाए हैं, वे प्रकाश स्तंभों के सामान
आने वाली शताब्दियों तक समाज को प्रेरणा और दिशा प्रदान करते रहेंगे.

एक अनुमान के अनुसार इन स्मारकों के लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण की लगभग पांच सौ एकड़ ज़मीन इस्तेमाल की जा रही है, जिसकी क़ीमत
क़रीब पाँच हजार करोड़ है.

ख़र्च

अधिकारियों के अनुसार क़रीब ढाई हज़ार करोड़ रूपया पुराने अंबेडकर स्मारक, पुस्तकालय, स्टेडियम और एक पुरानी कालोनी को तोड़ने
में लग गए.

 स्मारक समाज के वैचारिक सशक्तीकरण का एक माध्यम हैं और मैंने जो स्मारक बनवाए हैं, वे प्रकाश स्तंभों के सामान आने वाली शताब्दियों
तक समाज को प्रेरणा और दिशा प्रदान करते रहेंगे

फिर नगर विकास, आवास, संस्कृति, सिंचाई, पर्यटन और लोक निर्माण जैसे विभागों से कई हज़ार करोड़ रुपए नए निर्माण कार्य पर ख़र्च
हुए.

पिछले हफ़्ते इन स्मारकों का उदघाटन करते हुए मायावती ने कहा था कि स्मारकों का विरोध करने वाले लोग संकीर्ण जातिवादी मानसिकता
से ग्रस्त हैं.

मायावती का तर्क है की इन ‘स्मारकों संग्रहालयों, मूर्तियों और पार्कों पर ख़र्च किया गया धन उससे कहीं कम और नाम मात्र का है,
जो देश की राजधानी दिल्ली के राजघाट पर स्थित समाधियों की ज़मीन की ही अकेले क़ीमत है.

लेकिन लखनऊ में ही उनके स्वजातीय दलित समुदाय में इस बात को लेकर गहरी नाराज़गी है कि सरकार उनकी मूलभूत ज़रूरतों की अनदेखी करके
पत्थर के स्मारक बनवा रही हैं, जिनका उनके जीवन में कोई उपयोग नहीं है.

नाराज़गी

मुख्यमंत्री आवास और अम्बेडकर स्मारक से मात्र दो तीन किलोमीटर की दूरी पर है चमरई गाँव. यहाँ रैदास बिरादरी के लोग रहते हैं.

मूर्तियों के निर्माण में आने वाली लागत पर सवाल उठ रहे हैं

क़रीब 70 साल के बुज़ुर्ग राम सेवक एक हाथ में लाठी थामे थे और दूसरे हाथ में प्लास्टिक के एक डब्बे में पानी लिए थे.

राम सेवक ने बताया कि वह शौच के लिए सड़क पर जा रहे हैं क्योंकि उनके घर में शौचालय नही है. गाँव के अंदर जाने पर लोगों ने बताया
कि वे सभी लोग बाहर खुले में ही शौच जाते हैं.

एक दलित लड़की उर्मिला ने कहा कि इस गाँव में पीने के साफ़ पानी का भी इंतजाम नहीं है.

गाँव वालों ने मुझे एक पुराना कुँआ दिखाया जिसका पानी वह लोग पीते हैं. साफ़ पानी के लिए लोगों को दूर जाना पड़ता है. गाँव के लोगों
का कहना है कि पास में जो अस्पताल है वहाँ डाक्टर घूस माँगते है.

कुसुमा देवी को शिकायत है कि मुख्यमंत्री मायावती पास के अंबेडकर स्मारक और चौराहों का निरीक्षण करने अक्सर आती हैं लेकिन कभी
उनका हालचाल जानने की कोशिश नहीं की.

सच्चाई

गाँव वाले तो चाहकर भी मायावती से नहीं मिल सकते, चूँकि उनके घर के बाहर की सड़क पर सख़्त पहरा है और इस बार वह जनता दर्शन के लिए
भी लोगों को अपने बंगले नहीं आने देती.

गाँव वालों का कहना है कि मायावती अफ़सरों को भेजती हैं लेकिन वह उन्हें सच्चाई नहीं बताते.

पहले ये लोग मानते थे कि मायावती दलितों और ग़रीबों कि हितैषी हैं, लेकिन अब उनकी राय बदल रही है.

कुसुमा देवी और उसके पड़ोसियों का कहना है कि मायावती के राज में भी केवल बड़े लोगों की सुनवाई होती है.

इन लोगों को भी शिकायत है कि मायावती अपनी तिजोरी भरने में लगी हैं और उन्हें दलित या ग़रीब लोगों की परवाह नही है.

पहले दलित समुदाय के लोग मायावती को देवी की तरह पूजते थे. अब मायावाती ने चौराहों पर अपनी मूर्तियाँ लगवा दी हैं कि लोग उन्हें
आदर से पूजें, लेकिन अब लोगों की श्रद्धा ख़त्म होती जा रही है.

गाँव के लोगों का कहना था कि वह बाहर सड़क से ही अंबेडकर पार्क के अंदर लगे हाथी और मूर्तियाँ देख लेते हैं.

तौर-तरीक़ा

अंदर जाकर पास से देखने का मन नही होता. दो साल के इस कार्यकाल में दलित बुद्धिजीवी और अधिकारी भी मायावती के तौर तरीक़ों से ख़ुश
नहीं हैं.

 पहले वह इन पार्कों में जाकर खुश हो लेता था. लेकिन दलित समुदाय अब केवल जातीय स्वाभिमान, भावनात्मक और प्रतीकात्मक कार्यों से
संतुष्ट नहीं होता. वह अपने जीवन स्तर में सुधार और सता में भागीदारी चाहता है. जबकि मायावती ने इस कार्यकाल में इस ओर कुछ ख़ास
काम नहीं किया

दलित समुदाय में इस बात को लेकर ख़ासा असंतोष है कि माया सरकार में जो गाँवों में जो एक लाख बारह हज़ार सफ़ाई कर्मियों की भर्तियाँ
हुईं, उनमें उनको पर्याप्त हिस्सा नहीं मिला और इसमें सवर्णों का फ़ायदा हुआ और जमकर घूसखोरी हुई.

अब सरकार ने पाँच लाख तक के ठेकों में दलित समुदाय के लिए आरक्षण की घोषणा कि है लेकिन इसका लाभ उठाने वाले लोग अभी दलित समुदाय
में कम हैं.

गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान इलाहाबाद में दलित मामलों के विशेषज्ञ बद्री नारायण का कहना है कि दलितों में अब पहले
से अधिक चेतना आ गई है.

चेतना

उन्होंने कहा, “पहले वह इन पार्कों में जाकर खुश हो लेता था. लेकिन दलित समुदाय अब केवल जातीय स्वाभिमान, भावनात्मक और प्रतीकात्मक
कार्यों से संतुष्ट नहीं होता. वह अपने जीवन स्तर में सुधार और सता में भागीदारी चाहता है. जबकि मायावती ने इस कार्यकाल में इस
ओर कुछ ख़ास काम नहीं किया.”

सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी के लोग आम तौर पर शिकायत करते मिलते हैं कि सरकार में उनकी सुनवाई नहीं है और अफ़सरशाही हावी है.

एक दलित अधिकारी का कहना है कि अब मायावती अपनी पूँजी यानि दलित वोट बैंक भी गँवा रही हैं. आम आदमी तो क्या कभी उनके ख़ास माने
जाने वाले बड़े-बड़े दलित अधिकारी और नेता भी उनसे नहीं मिल सकते.

इन लोगों का कहना है कि हाल के लोकसभा चुनाव में बड़ा झटका खाने के बाद भी मायावती का मूर्ति प्रेम नहीं गया और समाज की बेहतरी
के लिए वे कोई ठोस क़दम नहीं उठा रही हैं.

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