तुम जियो हजारों सालः 8 की उम्र में शुरुआत, अगले 13 साल में बन गई भारत की शान

तुम जियो हजारों सालः 8 की उम्र में शुरुआत, अगले 13 साल में बन गई भारत की शानतुम जियो हजारों सालः 8 की उम्र में शुरुआत, अगले 13 साल में बन गई भारत की शान

नई दिल्ली, [स्पेशल डेस्क]। भारतीय खेल जगत में कई ऐसे खिलाड़ी हुए जिन्होंने सालों से देश का नाम रोशन किया है। इन्हीं में अब पीवी सिंधू का नाम भी जुड़ गया है। आज सिंधू पूरे 21 वर्ष की हो गई हैं और बैडमिंटन में देश को आगे ले जाने का उनका निरंतर प्रयास जारी है। वैसे जितनी शानदार सिंधू की सफलताएं, उतना ही दिलचस्प उनका सफर भी रहा है।

– वॉलीबॉल खिलाड़ियों के घर हुआ जन्म

पीवी सिंधू का जन्म आज ही के दिन 1995 में आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में हुआ था। उनके माता-पिता, पेशेवर वॉलीबॉल खिलाड़ी थे और साल 2000 में उनके पिता को वॉलीबॉल में शानदार योगदान के लिए अर्जुन अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था। सिंधू बचपन से ही ऐसे माहौल में बड़ी हुई हैं जहां खेलों की चर्चा आम थी। सबको उम्मीद थी कि वो भी अपने माता-पिता की तरह वॉलीबॉल खिलाड़ी बनेंगी लेकिन सिंधू ने अलग रास्ता चुना और इसकी वजह भी खास थी।

– आज जो कोच हैं, उनसे ही मिली थी प्रेरणा

आज जो राष्ट्रीय बैडमिंटन कोच हैं वही बने थे पीवी सिंधू की प्रेरणास्त्रोत। जी हां, सिंधू के मौजूदा कोच पुलेला गोपीचंद ही वजह बने थे कि उन्होंने वॉलीबॉल की जगह बैडमिंटन को चुना। 2001 में ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन चैंपियनशिप का खिताब जीतने वाले पुलेला गोपीचंद की सफलता को देखकर सिंधू इतना प्रेरित हुईं कि आठ साल की उम्र में ही उन्होंने बैंडमिंटन कोर्ट का रुख कर लिया था।

– ऐसे शुरू हुआ पहचान बनाने का सफर

गोपीचंद की बैडमिंटन अकादमी में दाखिल होने के बाद से सिंधू ने अपनी प्रतिभा के दम पर जलवा बिखेरना शुरू कर दिया था। पहले अंडर-10 का खिताब जीता, फिर अंडर-13 में दम दिखाया, अंडर-14 में स्वर्ण पदक जीता और राष्ट्रीय सब-जूनियर चैंपियनशिप में भी उनका नाम छा गया। भारतीय बैडमिंटन सर्किट में उनका नाम तेजी से बढ़ रहा था और सबको अहसास हो गया था कि सिंधू कुछ बड़ा हासिल करेंगी।

– 2010 में अंतरराष्ट्रीय सर्किट में पहला कदम 

मेक्सिको में आयोजित हुई 2010 की जूनियर विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में जब वो क्वार्टर फाइनल तक पहुंची तो उनकी पहचान और मजबूत हो गई। देखते-देखते उसी साल उबर कप के लिए उन्हें राष्ट्रीय सीनियर टीम में जगह मिल गई। ये जूनियर वर्ग से बाहर निकलते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिंधू का पहला कदम था। अगले दो सालों तक उन्होंने कड़ा संघर्ष किया, जिस दौरान उन्होंने दुनिया की दिग्गज सिंगल्स खिलाड़ियों को भी हराया और तमाम बड़े टूर्नामेंट में काफी आगे तक भी गईं लेकिन बड़ी सफलता का अब भी इंतजार था।

– 2013 में पहला खिताब और फिर धमाल ही धमाल

2013 में सिंधू ने मलेशिया ओपन का खिताब जीता और वो सुर्खियों में आ गईं। ये उनका पहला ग्रां प्रि खिताब था। अंतरराष्ट्रीय सर्किट पर साइना नेहवाल के अलावा और कोई भी सिंगल्स महिला भारतीय खिलाड़ी सालों से नजर नहीं आ रही थी। सिंधू ने इस इंतजार को खत्म कर दिया था। इसके बाद वो रुकी नहीं। उसी साल विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी (सिंगल्स) बनीं। साल के अंत में मकाउ ओपन का खिताब जीता और फिर भारत सरकार ने उन्हें उसी अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया जो सालों पहले उनके पिता ने भी जीता था। साल 2014 में वो विश्व चैंपियनशिप में लगातार दो बार पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनीं। अगले साल नवंबर में फिर से मकाउ ओपन का खिताब जीता।

– शानदार 2016, मिली सबसे बड़ी सफलता

फिर आया ओलंपिक वाला साल (2016) और साल की शुरुआत मलेशिया मास्टर्स का खिताब जीतकर हुई। उम्मीदें सातवें आसमान पर थीं। लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली साइना नेहवाल चोटिल हो चुकी थीं और अब रियो ओलंपिक में सारी उम्मीदें सिंधू से थीं। सिंधू ने कोच गोपीचंद की अगुआइ में देश व फैंस को निराश होने का कोई मौका नहीं दिया और ओलंपिक में फाइनल तक पहुंचने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं। फाइनल में स्पेन की दिग्गज कैरोलीना मारिन से कड़े मुकाबले के बाद हार तो मिली लेकिन वो रजत पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं। वो ओलंपिक रजत पदक जीतने वाली सबसे कम उम्र की भारतीय खिलाड़ी भी बनी थी। पूरे देश में उनका सम्मान हुआ और उम्मीदें अब भी जारी हैं।

 

By
Shivam Awasthi 

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