समलैंगिक संबंध अपराध नहीं: अदालत

अब तक भारत में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिकता गैरक़ानूनी थी

दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एपी शाह और न्यायाधीश एस मुरलीधर ने गुरुवार को अपने आदेश में कहा कि भारतीय दंड संहिता
(आईपीसी) की धारा 377 वैध नहीं है.

ये 148 साल पुराना क़ानून है जिसके तहत समलैंगिकता के लिए दस साल तक की क़ैद की सज़ा हो सकती है.

नाज़ फ़ाउंडेशन की ओर से ये जनहित याचिका वर्ष 2001 में दायर की गई थी जिसमें आईपीसी की धारा 377 को चुनौती दी गई थी.

 हमारे विचार में भारतीय संविधान के अनुसार आपराधिक क़ानून की किसी धारा की ग़लत समझ के कारण संविधान को ताक पर नहीं रखा जा सकता.
हम ये भूल नहीं सकते कि भेदभाव बराबरी के सिद्धांत के ख़िलाफ़ है और किसी व्यक्ति का आत्मसम्मान समानता के कारण ही आता है

नाज़ फ़ाउंडेशन ने इस आदेश का स्वागत किया है और फ़ाउंडेशन के बयान के अनुसार इसके आधार पर आपसी रज़ामंदी पर आधारित समलैंगिक यौन
संबंध अब अपराध नहीं हैं.

बराबरी और आत्मसम्मान

न्यायालय का तर्क था कि आईपीसी की धारा 377 से नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.

अदालत का कहना था कि आईपीसी धारा 377 से संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होता है जो हर नागरिक को ज़िंदगी और स्वतंत्रता का
मौलिक अधिकार देता है.

इस तरह से सात साल से चल रहे इस मामले में अदालत ने वयस्कों के बीच समलैंगिक संबधों को मान्यता दे दी है.

न्यायालय ने कहा है कि जब तक संसद इस क़ानून में संशोधन नहीं करती तब तक ये आदेश लागू रहेगा.

 ये भारत का स्टोनवॉल है. हम ख़ुश हैं. हमें जिन मौलिक और नागरिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा था, अब हम उनके हक़दार बन गए हैं.
इससे हमारा न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास बहाल हुआ है

न्यायालय का कहना था, “हमारे विचार में भारतीय संविधान के अनुसार आपराधिक क़ानून की किसी धारा की ग़लत समझ के कारण संविधान को
ताक पर नहीं रखा जा सकता.”

न्यायालय ने कहा, “हम ये भूल नहीं सकते कि भेदभाव बराबरी के सिद्धांत के ख़िलाफ़ है और किसी व्यक्ति का आत्मसम्मान समानता के कारण
ही आता है.”

अमरीका के न्यूयॉर्क में वर्ष 1969 में दंगे भड़के थे और इन घटनाओं को समलैंगिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष की बुनियाद माना
जाता है.

वकील और समलैंगिकों के अधिकारों के पक्षधर आदित्य बंदोपाध्याय ने बीबीसी को बताया, “ये भारत का स्टोनवॉल है. हम ख़ुश हैं. हमें
जिन मौलिक और नागरिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा था, अब हम उनके हक़दार बन गए हैं. इससे हमारा न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास
बहाल हुआ है.”

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