भोपाल गैस त्रासदी: दर्द ऐसा कि एक बुजुर्ग महिला कहती हैं, काश! मैं भी उस दिन मर गई होती

80 वर्षीय कृष्णा बाई दो दिसंबर 1984 की रात को याद करते हुए फफक-फफक कर राने लगती हैं. उनकी आंखों की कोर भी सूख नहीं पा रहीं थी. वह अपने पति को खोने का गम बयां नहीं कर पाती हैं, हां उनकी सुर्ख आंखें सबकुछ बता रही थीं. एक कोने में गुमसुम बैठी रहती हैं और उस रात का खौफ आज भी इनके चेहरे पर देखा जा सकता है.

 

उस खौफनाक रात को याद करते हुए करते हुए कृष्णा बाई बताती हैं,  ’आज भी लगता है, जैसे कल की बात हो. उस रात मैं, मेरे पति और दो बच्चे सो रहे थे, लेकिन आंखों में जलन होने की वजह से मैं जग गई. मैं सांस नहीं ले पा रही थी कि मुझे लगा कि पड़ोस की शादी में मिर्ची जलाई जा रही है लेकिन बाहर निकल कर देखा तो सब अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे.

 

अपने पति के साथ बच्चों को लेकर कृष्णा भागी. दूसरे दिन पति रामकिशोर और दोनों बच्चों के साथ अस्पताल गई थी. वह आगे बताती हैं,  ‘मेरी और मेरे बड़े बेटे की आखें फूल आयी थी. पति रामकिशोर के शरीर में बहुत सारा जहरीला धुआं भर गया, जिसकी वजह से उनका पेट फूल गया था.‘ प्राथमिक उपचार के बाद कृष्णा परिवार समेत उस जगह से दूर चली गई.

 

रामकिशोर की सेहत लगातार खराब होती रही. थोड़ी देर रूक कर आंसुओं को पोछते हुए कहती हैं ‘इस दुर्घटना के दो महीने के बाद मैंने अपना पति खो दिया, काश मैं भी उस दिन मर गई होती तो ये दिन तो ना देखने को मिलता.’

 

कृष्णा खुद छाती के दर्द और सांस की समस्या का शिकार हो गई थी . इस त्रासदी में पति की जान चली गई और पूरे परिवार की सेहत चैपट हो गई. सांस की तकलीफ के वजह से बड़ा बेटा काम नहीं कर सकता, छोटे बेटे की हार्डवेयर की दुकान है लेकिन लगातार डायलिसिस और सर्जरी के बाद अब वह भी काम नहीं कर सकता.

 

मुआवजे के तौर पर इनके साथ सिर्फ 25 हजार का मजाक किया गया और जो 200 रुपये की पेंशन मिलती थी, वह भी कई महीनों से नहीं मिली है.

 

अब भी न्याय की आस

आज भोपाल गैस त्रासदी को 31 साल पूरे हो गए है लेकिन आज भी लोगों को इंसाफ का इंतजार है. 2 दिसंबर 1984 की रात को यूनियन कार्बाइड के कारखाने से निकली जहरीली गैस ने हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया था तो कई आज भी जिंदगी से जंग लड़ रहे हैं. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक अब तक 15000  लोगों ने उस हादसे की वजह से जान गंवाई.

 

मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन तो अपनी स्वाभाविक मौत मर गया, उसे भारतीय कानून सजा नहीं दे पाया, इतिहास के आईने में झांक कर देखेंगे तो सजा ना मिल पाने का एक दागदार पन्ना देखने को मिलेगा. अब पीड़ितो की सिर्फ यही मांग है सही मुआवजा मिल जाए और उनके बच्चों को रोजगार के अवसर मुहैया कराए जाए.

 

पीड़ितों को आज तक इंसाफ ना मिल पाने की एक मुख्य वजह राजनैतिक इच्छाशक्ति कमी रही लेकिन लगातार 31 सालों से इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे लोगों के जज्बे को सलाम.

 

31 वर्षों के दौरान 7 मुख्यमंत्री, 7 प्रधानमंत्री और 27 मुख्य न्यायधीश बदलने के बाद भी इंसाफ ना पाने के बाद अब इन सभी प्रर्दशनकारियों की निगाहें अब मोदी सरकार पर टिकी हैं.

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