‘बाबरी विवाद के कागज़ात पेश होंगे’


बाबरी मस्जिद पर मालिकाना हक़ को लेकर 1949 से मुक़दमा चल रहा है

पिछले दिनों अदालत के लगातार कहने पर भी राज्य सरकार बाबरी मस्जिद विवाद से संबंधित सात अहम पुराने दस्तावेज अदालत में पेश नहीं
कर सकी थी.

ऐसा माना जा रहा था कि ये दस्तावेज ग़ायब हो गए हैं. पर कब और कैसे, इसे लेकर किसी के पास कोई जवाब नहीं था. अदालत ने इसे लेकर
सख़्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को कड़ी फटकार भी लगाई थी.

अब राज्य की मुख्यमंत्री मायावती ने कहा है कि राज्य सरकार इस मामले से संबंधित सभी ज़रूर कागजात अदालत में पेश करने को तैयार
है.

मायावती बुधवार को आयोजित एक संवाददता सम्मेलन में संवाददाताओं के सवालों का जवाब दे रही थीं.

बयान का स्वागत

बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफ़रयाब जिलानी ने मुख्यमंत्री मायावती के इस आश्वासन का स्वागत किया है.

अयोध्या की बाबरी मस्जिद पर पिछले छह दशक से इस बात को लेकर विवाद चल रहा है कि वह जगह हिंदुओं के आराध्य श्रीराम की जन्मभूमि
है या बाबरी मस्जिद.

बाबरी मस्जिद के नाम से मशहूर इस जगह पर निर्मित इमारत को छह दिसंबर 1992 को कट्टरपंथी हिंदुवादियों ने गिरा दिया था.

इसकी जाँच के लिए सरकार ने लिब्राहन आयोग का गठन किया था.इस आयोग ने मंगलवार को अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी है.

 अयोध्या के घटनाक्रम से मैं परेशान हूँ. मुझे उम्मीद है कि इस मामले में आप व्यक्तिगत रूप से दिलचस्पी लेंगे. वहाँ ग़लत उदाहरण
पेश किए जा रहे हैं जिसके परिणाम बुरे होंगे

इस विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर चल रहे मामले की सुनवाई अपने अंतिम चरण में है और अगली सुनवाई सात जुलाई को होगी.

बाबरी मस्जिद को लेकर विवाद दिसंबर 1949 से चल रहा है जब कथित तौर पर हिंदुओं ने उसके अंदर श्रीराम की मूर्तियाँ रख दी थीं.

अदालत ने राज्य सरकार से इस विवादित ज़मीन का मालिकाना हक़ तय करने में महत्वपूर्ण सात पुराने और अहम दस्तावेज़ दाख़िल करने को
कहा है.

हलांकि राज्य प्रशासन का कहना है कि ये दस्तावेज़ सरकारी रिकॉर्ड से 2002 से ही ग़ायब हैं.

अदालत के आदेश के बाद भी राज्य सरकार उन दस्तावेज़ों को आज तक अदालत के सामने पेश नहीं कर पाई है.

नोटिस का डर

अभी हाल ही में अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव अतुल गुप्त और प्रमुख गृहसचिव कुंवर फ़तेहबहादुर को नोटिस भेजकर चेतावनी दी थी कि
अगर जल्द ही दस्तावेज़ पेश नहीं किए गए तो उनके ख़िलाफ़ अदालत की अवमानना के तहत कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

इन दस्तावेज़ों में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ओर से राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को भेजा गया
टेलीग्राम भी शामिल है.

इस टेलीग्राम में नेहरू ने कहा है, “अयोध्या के घटनाक्रम से मैं परेशान हूँ. मुझे उम्मीद है कि इस मामले में आप व्यक्तिगत रूप
से दिलचस्पी लेंगे. वहाँ ग़लत उदाहरण पेश किए जा रहे हैं जिसके परिणाम बुरे होंगे.”

अन्य छह दस्तावेज़ों में राज्य सरकार और ज़िला प्रशासन के बीच हुआ पत्राचार शामिल है. ये दस्तावेज़ कुछ किताबों में प्रकाशित भी
हुए हैं.

इन पत्रों से पता चलता है कि तत्कालीन ज़िलाधिकारी केके नैयर ने विवादित परिसर से मूर्तियाँ हटाने से यह कहते हुए इनकार कर दिया
था कि इससे ख़ून-ख़राबा होगा.

अयोध्या में जुलाई 2005 में चरमपंथी हमले की कोशिश को सुरक्षा बलों ने नाकाम कर दिया था

ऐसा माना जाता है कि केके नैयर और उनकी पत्नी शकुंतला नैयर बाबरी मस्जिद पर कब्ज़ा करने के लिए हिंदुओं की मदद कर रहे थे.

बाद में यह दंपती हिंदू जनसंघ में शामिल हो गई थी और संसद में पहुँची थी.

विवाद की शुरुआत

हलांकि अदालत इस बात पर ज़ोर दे रही है कि राज्य सरकार इन दस्तावेजों को खोजकर पेश करे, जिससे 60 साल पुराने इस विवाद के शुरुआत
का पता चल सके.

वहीं राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों को डर है कि अगर वे इन दस्तावेज़ों को खोज नहीं पाए तो अदालत उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई
कर सकती है.

विवादित स्थल कड़े सुरक्षा घेरे में है, वहाँ किसी भी तरह की एकतरफा कार्रवाई देश में क़ानून-व्यवस्था की गंभीर समस्या पैदा कर
सकती है.

मुख्यमंत्री मायावती ने कहा है कि उनकी सरकार राज्य में क़ानून-व्यवस्था बनाए रखेगी और लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट के आधार पर किसी
भी सगंठन को सांप्रदायिक भावनाओं को उकसाने की इजाज़त नहीं देगी.

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