धार्मिक संगठनों ने आपत्ति जताई


अब तक भारत में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिकता गैरक़ानूनी थी

 प्रधानमंत्री ने मुझे, क़ानून मंत्री वीरप्पा मोइली और स्वास्थ्य मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद को इस बारे में चर्चा करने को कहा है.
बैठक निर्धारित हो गई है. नई सरकार है और नए मंत्री हैं, वे इस विषय पर नई सोच रख सकते हैं लेकिन फिर उसी फ़ैसले पर भी पहुँच सकते
हैं. लेकिन नई सोच के मुताबिक विचार रखने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता

न्यायलय में जनहित याचिका दायर करने वाली संस्था नाज़ फ़ाउंडेशन ने इस आदेश का स्वागत करते हुए कहा है, “इस फ़ैसले से दिल्ली उच्च न्यायलय ने यौन और जेंडर रूझानों से ऊपर उठकर सभी नागरिकों
के अधिकारों को मान्यता देने का ऐतिहासिक काम किया है.”

नाज़ फ़ाउंडेशन ने भरोसा जताया है कि इस फ़ैसले के बाद सार्वजनिक दायरों में पुलिस इत्यादि के ज़रिए और निजी दायरे में परिजनों,
परिचित लोगों और सहकर्मियों के ज़रिए समलैंगिकों के साथ होने वाले भेदभाव और उत्पीड़न पर अंकुश लगेगा.

धार्मिक संगठनों का विरोध

समलैंगिकों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध को जायज़ करार देने के दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले का तमाम धार्मिक संगठनों
ने विरोध किया है.उनका कहना है कि सभी धर्मों में इसे अपराध माना गया है और इसके लिए कड़े दंड का प्रावधान है.

 कुछ लोगों को मज़ा आता है इसीलिए उस चीज़ को कानूनी करार दिया जाए, ये कहाँ तक जायज़ है? कुछ लोगों को चोरी करने में मज़ा आता है,
कुछ कम उम्र के बच्चों को वयस्कों के साथ संबंध बनाने में मज़ा आता है तो क्या हम उसे क़ानूनी दर्जा दे देंगे?

हिन्दू, मुस्लिम या ईसाई, सब आपस में भाई भाई- समलैंगिकता के मुद्दे ने इसे साकार कर दिया है. कम से कम ये एक ऐसा मसला सामने आया
है जिसने आपस में छत्तीस का आंकड़ा रखने वालों का गणित बदल दिया है.

मनुस्मृति से लेकर, आदम हौआ और कुरान की कहानियों की दुहाई देते हुए सभी धार्मिक संगठनों की ओर से एक ही आवाज़ आ रही है- समलैंगिकों
के बीच का कोई भी शारीरिक संबंध न केवल अनैतिक है, बल्कि धार्मिक दृष्टि से आपराधिक भी है.

विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता सुरेंद्र जैन ने दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले पर कहा, “कुछ लोगों को मज़ा आता है इसीलिए उस चीज़ को
कानूनी करार दिया जाए, ये कहाँ तक जायज़ है? कुछ लोगों को चोरी करने में मज़ा आता है, कुछ कम उम्र के बच्चों को वयस्कों के साथ
संबंध बनाने में मज़ा आता है तो क्या हम उसे क़ानूनी दर्जा दे देंगे? कुछ लोगों को जानवरों के साथ संबंध बनाने में मज़ा आता है तो
क्या यही हाई कोर्ट आगे जाकर इन संबंधों को भी न्यायोचित ठहरानेवाला है?”

मुस्लिम संगठनों का विरोध

समलैंगिकों के पक्ष में हुए दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले का विरोध मुस्लिम संगठनों ने भी किया है. मुसलमानों की ओर से जमायतुल-
उलेमा- ए -हिंद के वरिष्ठ प्रवक्ता मौलाना अब्दुल हमीद नूमानी का कहना है कि चंद लोगों की चंद लम्हों की ख़ुशी के नाम पर अगर सदियों
की परंपरा को यूँ ही कुर्बान कर दिया जाएगा तो कल समाज में और भी अराजकता फैलेगी.

 हमारा रवैया हमेशा स्पष्ट रहा है. हमें रज़ामंद वयस्कों के बीच समलैंगिक व्यवहार को अपराध न मानने से कोई परेशानी नहीं है. हम
समलैंगिकों को अपराधी नहीं मानते. लेकिन चर्च इस व्यवहार को उचित नहीं ठहरा सकती. यह प्राकृतिक या फिर नैतिक नहीं है

वो कहते हैं, “मनुस्मृति में भी इसके लिए बहुत बड़ा दंड है ओर शरिया में तो इसे बहुत बड़ा अपराध माना गया है. इसमें पत्थर मरकर
मौत देने की, पहाड़ पर से, माकन पर से गिराकर मार देने की और जलाने की भी सज़ा की बात की गई है. इसके बड़े ही दूरगामी परिणाम होंगे
और समाज बर्बादी की ओर जाएगा.”

अपने हिंदू ओर मुसलमान साथियों के साथ सुर में सुर मिलाते हुए ईसाई संगठनों ने भी दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले से अपनी असहमति जताई
है.

कैथोलिक बिशप्स कॉंफ्रेंस ऑफ़ इंडिया के फादर डोमिनिक इमैनुएल का कहना है, “हमारा रवैया हमेशा स्पष्ट रहा है. हमें रज़ामंद वयस्कों
के बीच समलैंगिक व्यवहार को अपराध न मानने से कोई परेशानी नहीं है. हम समलैंगिकों को अपराधी नहीं मानते. लेकिन चर्च इस व्यवहार
को उचित नहीं ठहरा सकती. यह प्राकृतिक या फिर नैतिक नहीं है.”

धार्मिक नेताओं की प्रतिक्रिया अनुकूल नहीं है लेकिन समलैंगिक रिश्तों के हिमायती मानते हैं कि उनकी भावनाएँ धर्मों की सीमाओं
के पार इंसानियत के दायरे में आते हैं ओर आज उन्हें इस बात की ख़ुशी है की उनके रिश्ते को भले ही अप्राकृतिक या अनैतिक कहा जा
रहा हो, कम से कम अपराधी होने के अपराध से तो वो अब ग्रसित नहीं होंगे.

अन्य प्रतिक्रियाएँ

मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच के स्कॉट लॉंग ने कहा, “अंग्रज़ों के समय के इस क़ानून के ज़रिए लोगों को उनके मौलिक अधिकारों से लंबे सय तक वंचित रखा गया है.
ये फ़ैसला भारत में लोकतंत्र और अधिकारों की पहुँच का प्रमाण है.”

समलैंगिकों के अधिकारों के पक्षधर और भारत की पहली समलैंगिकों की पत्रिका के संपादक अशोक रो कवी का कहना था, “इस आदेश के बावजूद सामाजिक तौर पर धब्बा तो रहेगा, ये लंबा संघर्ष है. लेकिन इससे एचआईवी की रोकथाम में मदद मिलेगी.
समलैंगिक पुरुष अब डॉक्टरों के साथ खुलकर अपनी समस्याओं को बारे में बात कर सकते हैं. इससे पुलिस थाने में होने वाली परेशानी भी
बंद हो जाएगी.”

 अंग्रज़ों के समय के इस क़ानून के ज़रिए लोगों को उनके मौलिक अधिकारों से लंबे समय तक वंचित रखा गया है. ये फ़ैसला भारत में लोकतंत्र
और अधिकारों की पहुँच का प्रमाण है

उधर कैथोलिक बिशप्स काउंसिल के फ़ादर डॉमिनिक इमैनुयल ने कहा कि चर्च समलैंगिक व्यवहार को उचित नहीं ठहराती.

वकील और समलैंगिकों के अधिकारों के पक्षधर आदित्य बंदोपाध्याय ने बीबीसी को बताया, “ये भारत का स्टोनवॉल है. हम ख़ुश हैं. हमें जिन मौलिक और नागरिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा था, अब हम
उनके हक़दार बन गए हैं. इससे हमारा न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास बहाल हुआ है.”

उधर कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अहमद ने पूरे मामले पल्ला झाड़ लिया और कहा, “ये न्यायालय और सरकार के बीच का मामला है कि कांग्रेस पार्टी का इससे कोई संबंध नहीं
है.”

गृह मंत्री पी चिदंबरम का कहना था, “प्रधानमंत्री ने मुझे, क़ानून मंत्री वीरप्पा मोइली और स्वास्थ्य मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद को इस बारे में चर्चा
करने को कहा है. बैठक निर्धारित हो गई है. नई सरकार है और नए मंत्री हैं, वे इस विषय पर नई सोच रख सकते हैं लेकिन फिर उसी फ़ैसले
पर भी पहुँच सकते हैं. लेकिन नई सोच के मुताबिक विचार रखने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता.”

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