ग्राउंड जीरो: क्यों जल रहा है नेपाल, क्या है परेशानी, जानें हर सवाल का जवाब

काठमांडू : 10 हजार रुपए का एलपीजी सिलेंडर और 400 रुपए लीटर पेट्रोल. नेपाल नए मानवीय संकट की दहलीज पर है. यह संकट खड़ा हुआ है नेपाल में नया संविधान लागू होने से. पिछले 105 दिनों से मधेशी और जनजाति समुदाय ने नए संविधान में अपने हितों की अनदेखी होने पर आंदोलन छेड़ दिया है. हिंसक टकराव में 40 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं.

 

तराई से राजधानी काठमांडू जाने वाले सभी सड़कें बंद कर दी गई हैं. भारत से सामान ले जाने वाले ट्रकों को आगे नहीं जाने दिया जा रहा. इसका असर यह है कि काठमांडू में तेल, गैस, खाने पीने के सामान और दवाइयों की भारी किल्लत हो गई है.

 

पेश है आपके चैनल की पूरी पड़ताल

 

बीरगंज से काठमांडू तक हर जगह लोग परेशान हैं. सिलेंडर खरीदने वालों की लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं. पेट्रोल के लिए हाहाकार मचा हुआ है. नेपाल की सबसे बड़ी मुश्किल है पेट की भूख जो तब बुझेगी जब 9 दिनों से गैस सिलेंडर के लिए लाइन लगाकर बैठे आम लोगों को रसोई गैस मिलेगी. वो गैस जिसे भारत से नेपाल पहुंचना है लेकिन आंदोलनकारियों ने रास्ते बंद कर रखे हैं.

 

काठमांडू में महागकाल इलाके के घर पर रोज सुबह ताला इस उम्मीद में लगता है कि कल शायद इसकी नौबत नहीं आएगी लेकिन शाम को एक बुजुर्ग महिला लौटकर ताला खोलती है तो जंग हारकर लौटे सिपाही का दर्द चेहरे पर साफ दिखता है. नौ दिन हो गए. वही रास्ता, वही मकसद और वही कभी न खत्म होने वाला इंतजार फिर भी 60 साल की क्रिता राय ने उम्मीद का दामन पकड़ रखा है. एलपीजी के आधे सिलेंडर के लिए वो रोज गैस एजेंसी के बाहर लगी उस लाइन का हिस्सा बनती है जिसके दोनों सिरों का फासला मीटरों से किलोमीटर हो चुका है.

 

क्रिता राय कहती हैं, “तीन सिलेंडर हैं मेरे घर में लेकिन गैस एक में भी नहीं. मधेशियों की आर्थिक नाकाबंदी से गैस नहीं मिल रही. भारत से आ ही नहीं रही. अब लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाती हूं. मकान मालिक कहता है मकान खाली करवा लूंगा. हम गरीब लोग हैं आठ दस हजार रुपए में गैस सिलेंडर कैसे खरीदें.”

 

क्रिता नेपाल के पहाड़ी समुदाय से है और अपने नाती के साथ एक छोटे से घर में रहती है. बेटी दिल्ली के कॉल सेंटर में काम करती है. हर महीने 15 हजार रुपए भेजती है तो मां और बेटे का चूल्हा जलता है. क्रिता अब इसलिए भी परेशान है कि बॉर्डर पर नाकाबंदी के कारण पांच हजार में उसका घर कैसे चलेगा बाकी का दस हजार तो मकान के भाड़े और नाती की स्कूल फीस में निकल जाता है.

 

क्रिता राय आगे कहती है, “मेरी मोदी सरकार से हाथ जोड कर निवेदन है कि वो मधेशियों का आर्थिक नाकाबंदी खत्म करवाएं. हम गरीब लोग बहुत तंग है और नेपाल सरकार से निवेदन है कि कालाबाजारी को रोके.”

 

नेपाल के मूल निवासी यानी पहाड़ी और तराई में रहने वाले मधेशियों के बीच वजूद की लड़ाई से पैदा हुई किल्लत और महंगाई की चक्की में दोनों एक साथ पिस रहे हैं. राजधानी काठमांडू के बुद्धनगर में हाल बुरा है. यहां एक घर को नेपाल पुलिस के एक पूर्व एसएसपी ने दस साल पहले बनाया था. इसमें एक मधेशी दंपति किराए पर रहता है. पति राजीव कंसट्रक्शन कंपनी में काम करते हैं और पत्नी सीमा वर्मा चूल्हा फूंककर रोटी का इंतजाम करने को मजबूर है.

 

सीमा वर्मा चूल्हे में फूंक मारकर चाय बना रही है. वो कहती है गैस नहीं मिल रही इसलिए हमने ईंट से यह चूल्हा तैयार कर लिया. अब डेढ़ महीने से इसी पर खाना पकाती है. खाना बनने में भी घंटों लगते हैं और काले बर्तन साफ करने में भी.

सीमा वर्मा मधेशी है, उसे भी खांसते हुए खाना पकाना पड़ रहा है, इसके बावजूद उसे वो अपने मधेशी समुदाय के हक के लिए ऐसी परेशानियों से गुजरने को तैयार है. यही जिद नेपाल के मौजूदा संकट की वजह है.

 

सीमा वर्मा कहती हैं, “लोगों को उनका हक मिलना चाहिए. हमें तो दस महीने खाना इसी चूल्हे पर पकाना पड़े तो पका लेंगे लेकिन संविधान बदलना चाहिए. मकान मालिक बोलता है कि धुएं से सारा मकान खराब हो रहा है आप डेरा बदल लीजिए.”

 

हिमालय की गोद में नेपाल की एक धरती ही पर रहने वाले दो समुदाय के बीच दूरियां बढ़ रही है. नौबत बेघर होने की है पर जिद्द से पीछे हटने को न एक तैयार है न दूसरा.

 

पूर्व एसएसपी सदानंद का कहना है, “घर से मुझे लगाव है. मैंने इनको बोला कि आप धुएं से गंदा कर रह हो इस लिए घर बदल लो.”

 

लेकिन एक छात्र सुमंतो थापा का कहना है, “यह टोटली राजनैतिक है. मोदी और मधेशी मिले हुए हैं. उनका रहन सहन भारत जैसा है इसलिए मधेशी अलग होना चाहते हैं. सब मिले हुए हैं. वो अपने घरों में गैस जला रहे हैं. पेट्रोल की दिक्कत नहीं है उनको और यहां जनता दुखी है.”

 

40 साल के गोबिंद को गले की बीमारी है. ऑपरेशन हुआ था. सांस लेने में दिक्क्त होती है फिर भी दिन भर गैस लेने के लिए लाइन में लगता है और रात को घर में चूल्हा जलता है तो धुंए से बचने के लिए घर से दूर रहना पड़ता है.

 

गोबिंद का कहना है, “पता नहीं गैस कब मिलेगी ब्लैक में खरीदने की हमारी औकात नहीं. आठ या दस हजार में. मोदी सरकार को हमारी हाथ जोड़कर बिनती है कि हम मानव हैं हमें दानव जैसा कष्ट न दें. नाका खुलवाएं और भारत से गैस आएगी तो हमारी मुश्किल हल होगी. मोदी सरकार को यह सुना दें.”

 

उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री कमल थापा का कहना है, “दीवाली और छठ का त्यौहार था. हमारे लोगों ने इस बार काली दीवाली मनाई.”

 

पहाड़ी और मधेशी लोगों बर्चस्व और वजूद की लड़ाई जीतना चाहते हैं लेकिन चूल्हे की जंग दोनों हार चुके हैं. एलपीजी की सप्लाई ठप होने के बाद घरों में ही नहीं रेस्तरां में गैस के चूल्हे की जगह लकड़ी के चूल्हे ने ले ली है.

 

हर घर परेशान

 

कुकिंग गैस और पेट्रोल की शॉर्टेज से काठमांडू में हर घर परेशान है. स्कूल बंद, कारोबार बंद, खाना पीना महंगा और जेब ठनठन गोपाल. नाकाबंदी लंबी खिंचने से काठमांडू की सड़कों पर वाहन घटे हैं और बसों में भीड़ बेहिसाब बढ़ी है. सीट से लेकर फर्श तक और सीढी से लेकर छत तक बसों में पैर रखने की जगह नहीं. महिलाएं भी मजबूरी में छत पर सफर करती हैं.

 

काठमांडू में जितनी बसें सड़कों पर दौड़ रही है उससे कई गुणा ज्यादा पेट्रोल पंप के बाहर लाइनों में खड़ी हैं. जुगाड़ के डीजल से मुसाफिरों को ढोह रही बसों में न चढ़ने की जगह है और न बैठने की. जो बस 15 सवारियों के लिए बनी है लेकिन सफर 40 कर रहे हैं.

 

ये संकट सिर्फ नेपाल की जनता का नहीं है बल्कि नेपाल की उस नई सरकार का भी है जिसे सत्ता में आए सिर्फ दो महीने ही हुए हैं. यह पहले से तय था कि नया संविधान लागू होने के बाद सुशील कोईराला प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली करेंगे. इसके बाद के पी ओली प्रधानमंत्री बने. इधर सत्ता ने करवट बदली और उधर नेपाल के बुरे दिन शुरू हो गए.

 

नेपाल में यह क्यों हो रहा है?

 

2008 में राजशाही के खात्मे के बाद नेपाल का शासन अंतरिम संधिवान के तहत चल रहा था. संघीय राजनीति ढांचा स्थापित करने लिए संविधान सभा नए संविधान का ड्राफ्ट तैयार कर रही थी. पहली संविधान सभा में यह संभव नहीं हो पाया. 2013 में दूसरी संविधान बनी. सुशील कोइराल प्रधानमंत्री बने. सितंबर 2015 में संविधान जारी हुआ और कोईराला को डील के तहत पद से हटना पड़ा.

 

केपी ओली की नेपाल कम्युनिस्टी पार्टी युनाइटेड मार्क्सवादी लेनिनवादी, प्रचंड की युनाइटेड सीपीएम माओवादी और थापा की राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी नेपाल गठजोड़ हुआ. केपी ओली नए प्रधानमंत्री बने. नेपाल के नए संविधान को लेकर भारत पहले से चिंतित था. पड़ोसी के नाते उसने नेपाल सरकार को मधेशियों के हितों को नजरअंदाज न करने की सलाह भी दी पर उस पर गौर नहीं हुआ.

 

राजनीतिक एक्सपर्ट सीके लाल का कहना है, “नए संविधान से संकट खड़ा हो गया है. मधेशी समुदाय आंदोलन कर रहा है. आर्थिक नाकाबंदी की गई है और भारत और नेपाल सरकार के संबंधो में खटास पैदा हुई है. एक संप्रादायिक विभाजन जैसा दिख रहा है.”

 

नए संविधान में क्या है?

 

आखिर नए संविधान में किस बदलाव की मांग को लेकर शुरू हुआ है मधेशी आंदोलन. ये समझने की कोशिश करते हैं.

 

मांग ये है कि नेपाल के अंतरिम संविधान में मधेशियों के लिए तय किए गए आठ बिंदुओं को नए संविधान में भी शामिल किए जाए.

1. इन मांगों में सबसे अहम है कि मधेशियों और जनजातियों को संवैधानिक पदों से वंचित न रखा जाए.

2. सेना और पुलिस बल में मधेशियों को उनकी आबादी के लिहाज से भर्ती किया जाए, निर्वाचन क्षे़त्र भूगोल की बजाय जनसंख्या के आधार पर तय हों.

3. संघीय ढांचे के ऊपरी सदन यानी राष्ट्रीय सभा में हर राज्य से 8 सदस्य मनोनीत करने की बजाय जनसंख्या के आधार पर सदस्यों की संख्या तय हो .

4. गैर-नेपाली महिला से शादी होने पर पूर्ण नागरिकता के लिए 20 साल अनिवार्य की शर्त में संशोधन हो.

5. उसे सरकारी नौकरी के लिए 10 साल बाद योग्य मानने की शर्त हटाई जाए.

6. साथ ही उसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, सभा, उप सभा प्रमुख, और निकाय सभा प्रमुख जैसे संवैधानिक पदों पर नियुक्ति का अधिकार मिले.

7. मधेशी बाहुल जिला कैलाली, झापा, कंचनपुर, मोरंग और सुनसरी को मधेश प्रदेश में शामिल किया जाए. क्योंकि इन जिलों में मधेशियों की जनसंख्या ज्यादा है. उनको पहाड़ी निर्वाचन क्षे़त्रों से जुदा किया जाए.

8. आरक्षण कोटा का आधार जनसंख्या न हो. अभी 80 फीसदी नेपाली पहाड़ी वर्ग को आरक्षण कोटा में रखा गया है.

 

मधेशी आंदोलन को लेकर भारत के रुख और आंदोलनकारियों में गुस्से की बड़ी वजह यह भी है कि उन्हें लगता है कि संविधान में सशोंधन अगर मौजूदा सरकार ने नहीं किया तो फिर कभी नहीं हो पाएगा क्योंकि न तो कभी एक साथ तीन राजनीतिक पार्टियों का गठबंधन होगा और न ही संशोधन के लिए जरुरी दो तिहाई बहुमत का जुगाड़. प्रधानमंत्री कोली की सरकार तीन पार्टियों के गठजोड़ से चल रही है. तीनों को मिलाकर सरकार के पास 601 में से 291 सीटें हैं.

 

संविधान एक्सपर्ट दीपेंद्र झा कहते हैं, अभी नहीं तो कभी नहीं. फिर कभी न तीन पार्टिया इक्टठी होंगी और न दो तिहाई बहुमत बन पाएगा. अगर अब संशोधन नहीं हुआ तो राज्यों में सरकार के लिए चुनाव हो जाएंगे और बाद में फेडरल बाउंडरी को बदलने के लिए वहां की सभाओं में भी दो तिहाई बहुमत नहीं मिलेगा. कोई प्रदेश सरकार क्यों अपनी सीमा बदलने के लिए सहमती देगी.

 

सवाल यह भी कि भारत की दोस्ती और दवाब के बावजूद नेपाल ने अंतरिम संविधान के उन आठ प्रावधानों को नए सविंधान में शामिल क्यों नहीं किया जिन्हें राजशाही के खात्मे के बाद भारत की मध्यस्थता से गिरिजा कुमार कोईराला की सरकार ने बनाया था.

 

सीके लाल का कहना है कि नेपाल सरकार को लगा कि आंतरिक संविधान की शर्तों से वो कमजोर थे. अब राजनीति गणित उनके हाथ में है तो बर्चस्व की निरंतरता रहे. मधेशियों को बांटा जाए ताकि राजनीतिक रुप से वो उनकी बराबरी न कर सके. एक संप्रदायिक सोच के तहत किया गया नए संविधान में यह सब.

 

भारत की सरकार, मधेशी मुद्दों के माहिर और राजनीति के पंडित चाहे जो भी कहने पर नेपाल सरकार का मानना है कि कमियां हर चीज में होती है बावजूद इसके नेपाल का संविधान दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में बेहतरीन संविधान है.

 

कमल थापा का कहना है कि साउथ ऐशियाई देशों में यह बेस्ट संविधान है. इसमें यह प्रावधान हैं. इसमें अमेरिका से लेकर भारत तक के संविधान के प्रावधानों को ध्यान में रखा गया. फिर भी शार्ट कमिंग्स हैं तो उन्हें बातचीत और कनसेस से हल करने को तैयार है नेपाल सरकार. लेकिन आंदोलन कर रहे राजनीतिक दल अपनी मांगे तय नहीं कर पा रहे हैं. आंदोलन उनके हाथ से खिसक गया है.

 

नेपाल सरकार भले ही दावा कर रही है कि मधेशियों के हाथ से आंदोलन खिसक रहा है लेकिन दूसरी तरफ पहाड़ी आबादी के भी सड़क पर उतरने का अंदेशा. संकट गहरा रहा है और मधेशी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. आखिर कौन हैं ये मधेशी और देखिए कैसे उनके आंदोलन ने नेपाल को गैस पेट्रोल और दवाइयों के लिए तरसा दिया है.

 

कौन हैं मधेशी?

 

नेपाल की जनसंख्या 2 करोड़ 60 लाख के करीब है. इसमें 52 लाख मधेशी हैं. सुगौली संधि के तहत गंगा मैदान के फैलाव में रहने वाली ये आबादी नेपाल का हिस्सा हैं. मधेशी सिर्फ नेपाल में है. भारत की सीमा के साथ होने के कारण मधेशियों का रहन सहन, उठना बैठना और शक्लोसूरत नेपाल से कम और उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों से ज्यादा मिलता जुलता है.

 

सी.के.लाल का कहना है कि नेपाल के मेची से महाकाली तक सुगौली संधि के बाद जो इलाके ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1875 के विद्रोह में गुरखालियों को मदद दिए थे वो मधेश क्षेत्र है.

 

मधेशियों का आरोप है कि उन्हें नेपाल ने कभी अपना माना ही नहीं. उनके हमेशा भारतीय बताकर पक्षपात किया गया. लेकिन नेपाल सरकार कहती है मधेशी उनके लिए पराए नहीं हैं.

 

कमल थापा का कहना है कि मधेशी नेपाल के नागरिक हैं. उनकी मांगों को हम पूरा करेंगे, संशोधन करेंगे. वो हमारे साथ रहेंगे राजनीति में भी और नेपाल में भी.

 

लेकिन मधेशियों को इस पर भरोसा नहीं है और इसीलिए मधेशियों ने छेड़ दिया आंदोलन. भारत और नेपाली की रक्सौल बीरगंज सीमा के बीच 500 मीटर के नो मैन्स लैंड एरिया में मधेशी धरना दे रहे है. भारत की ओर से सामान नेपाल में दाखिल नहीं होने दिया जा रहा. हालांकि भारत से नेपाल जाने के लिए और कई रास्ते भी हैं लेकिन व्यापार इसी सीमा से होता है.

Tags:
author

Author: