गर्म होती धरती का बड़ा विलेन कौन- भारत या अमेरिका?

नई दिल्ली/शिकागो: आप जानते ही हैं कि फ्रांस की राजधानी पेरिस में पूरी दुनिया मिलकर इस बात पर चर्चा कर रही है कि धरती के बढ़ते तापमान को कैसे रोका जाए. धरती अगर यूं ही गर्म होती रही तो हर तरफ तबाही के निशान दिखाई देंगे. दिल्ली की फिजाओं में दिखाई देता प्रदूषण भी इसी का नतीजा है.

 

एबीपी न्यूज ने की है भारत से लेकर अमेरिका तक की पड़ताल. और इस पड़ताल में हमने ये जानने की कोशिश की है गर्म होती धरती का बड़ा विलेन कौन है. भारत या फिर अमेरिका.

 

आज कहानी दो अलग-अलग देशों के दो अलग-अलग परिवारों की है. वो परिवार जो भारत और अमेरिका की तस्वीर पेश करने वाले हैं.

 

पहला – दिल्ली के बगल में यूपी के नोएडा में रहने वाला शर्मा परिवार है और दूसरा- राजधानी दिल्ली से करीब 12 हजार किमी दूर बसा अमेरिका के शिकागो में रहने वाला खुशालानी परिवार.

 

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दोनों परिवार भारतीय हैं लेकिन दोनों की हवा अलग है. खाना अलग है.  और रहने का तरीका अलग है. इतना कुछ अलग है और इसीलिए दोनों घरों से निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा भी अलग है.

 

एक के घर में पूरे साल एसी चलता है, और दूसरे घर में साल के 6 महीने सिर्फ पंखे से काम चलता है. अमेरिका के खुशालानी परिवार में बर्तन भी डिश वॉशर यानि मशीन में धुलते हैं और नोएडा के शर्मा परिवार में बर्तन हाथ से धोए जाते हैं.

 

कुछ इसी तरह हम आपको बताएंगे कि सुबह सोकर उठने से लेकर रात को सोने तक दोनों परिवार जो कुछ करते हैं उससे धरती में कितनी कार्बन डाई ऑक्साइड जा रही है. मतलब मिसाल के तौर पर भारत का एक परिवार और अमेरिका का एक परिवार धरती को कितना गर्म कर रहा है. दरअसल वायुमंडल में जितनी ज्यादा कार्बन डाई ऑक्साइड जा रही है धरती उतनी ही गर्म हो रही है.

 

सबसे पहले बात करेंगे बिजली की. और इस सवाल का जवाब ढूंढेंगे कि भारत और अमेरिका दोनों में से कौन सा परिवार ज्यादा बिजली खर्च करता है.

शुरुआत शिकागो के इलिनॉय में रहने वाले खुशालानी परिवार से जहां पति पत्नी और तीन बच्चे रहते हैं. 7 साल का कृष्णा, 4 साल का ईशान और 18 महीने का विहान. कृष्णा और ईशान स्कूल जाते हैं और सुबह उठते ही खुशालानी परिवार के घर से कार्बन डाई ऑक्साइड निकलनी शुरू हो जाती है. यहां ठंड का आलम कुछ ऐसा होता है कि तापमान 0 से लेकर माइनस 15 तक चला जाता है. ऐसे में बच्चे जब स्कूल के लिए उठते हैं तो गर्म पानी चाहिए होता है.

 

बेइंतेहा साधन हैं तो इस्तेमाल क्यों ना किया जाए ये मानसिकता अमेरिका में आम है. पानी, बिजली और कागज का बहुत इस्तेमाल होता है विकसित देशों में. ये जरूरत बन गया है और इसका हल अब निकाला जा रहा है.

 

खाना गर्म होने के लिए माइक्रोवेव का इस्तेमाल होता है. घर में बर्तन धोने के लिए डिश वॉशर चलाया जाता है. बची कुची कसर अमेरिका की ठंड पूरी कर देती है क्योंकि घर का तापमान एक जैसा रखने के लिए पूरे वक्त एसी चलाकर रहना पड़ता है.

खुशालानी की पत्नी कहती हैं, भारत में हम खिड़की खोल के रखते हैं लेकिन यहां नहीं खोलें तो पूरा दिन एसी या हीटर चलता है. वहां कपड़े बाहर सुखाते हैं यहां आप ड्रायर में सुखा रहे हो और बर्तन भी रखकर अपने आप सूखते हैं लेकिन यहां डिश वॉशर में ही बर्तन ड्रायर से सूखते हैं वो और आधा घंटा लेता है.

 

इसके अलावा घर में टीवी चलता है. लैपटॉप चलता है. मोबाइल चार्ज होता है. बच्चे गेम खेलते हैं और खिलौने भी बिजली से ही चलते हैं. बच्चे खेल रहे हैं तो अपने खिलौनों को बिजली से कनेक्ट करके ही खेलते हैं तो वहां बिजली खर्च होती है. अभी ठंड है तो बच्चे दिनभर घर में रहते हैं अभी अंधेरा भी जल्दी हो जाता है तो लाइट भी जलानी पड़ती हैं. अगर बाजार जा रहे हैं तो बार-बार जाने की जगह एक बार में ही सामान ले आते हैं तो उसके लिए बड़ा फ्रिज चाहिए कई लोग तो दो फ्रिज भी रखते हैं.

 

जानते हैं घर में किस चीज से बेवजह ऊर्जा का इस्तेमाल होता है. खाली चार्जर में या फिर टीवी को रिमोट से बंद कर दें लेकिन स्विच बंद ना हो. पर्यावरण विशेषज्ञ के मुताबिक सोने से पहले जितना हो लाइट और ऐसे स्विच को बंद कर दें इससे कार्बन कम निकलेगा बल्कि बिजली का बिल भी कम आएगा.

 

ये तो घर की रोजमर्रा के कामकाज और जरूरतों का हिसाब है अब जरा बच्चों की जरूरतों के बारे में भी जान लीजिए.

 

खुशालानी का कहना है कि जो 8 साल का बच्चा है उसका खुद का लैपटॉप है. 4 साल के बच्चे का डेस्कटॉप है वो लर्निंग एप से सुबह शाम 1-1 घंटा उसको चलाता है मेरी पत्नी का लैपटॉप और एक काम करने का है. तीन लैपटॉप, एक डेस्कटॉप, तीन टैबलेट सबके फोन इसके अलावा टीवी. लिविंग रूम में 4 लाइट मिनिमम, जाने के रास्ते में 6-7 लाइटें सिर्फ दो रूम में लाइटें 10-12 हो जाती हैं.

 

शिकागो के इलिनॉय में रहने वाला खुशालानी परिवार जितनी बिजली खर्च करता है उससे करीब 2.53 टन कार्बन डाई ऑक्साइड हर साल वायुमंडल में जा रही है.

 

नोएडा के परिवार का हाल

 

अब जरा नोएडा के शर्मा परिवार में खर्च होने वाली बिजली का हिसाब-किताब भी जान लीजिए. घर में कुल पांच सदस्य हैं. पति-पत्नी दो बच्चे और एक ड्राइवर. राज शर्मा पेशे से बिजनेसमैन हैं और पत्नी प्रीति बुटीक चलाती हैं.

 

ये कमरा 12 साल की खुशी और 7 साल के धैर्य का है. भाई-बहन अपने कमरे में ही टीवी देखते हैं और पढ़ाई भी करते हैं. कमरे में रोशनी ऐसी है कि दिन में भी ट्यूबलाइट जलाए बिना काम नहीं चलता. ज्यादा गर्मी में एसी और सर्दियों में ब्लोअर भी चलता है.

 

दूसरा कमरा मास्टर बेडरूम हैं. बहुत कम ऐसा होता है जब पूरा परिवार एक ही कमरे में हो ऐसे में 2 एसी, 2 पंखे, 2 ट्यूबलाइट और सर्दियों में गर्म पानी के लिए गीजर भी चलता है.

 

शर्मा जी की रसोई में भी कम बिजली खर्च नहीं होती. माइक्रोवेव से लेकर मिक्सी तक और आरओ से लेकर फ्रिज तक का इस्तेमाल होता है. घर में 600 लीटर का फ्रिज है. रसोई से बाहर निकलिए तो म्यूजिक सिस्टम से लेकर मोबाइल तक की लंबी फेहरिस्त है जिसमें बिजली का इस्तेमाल होता है.

शर्मा परिवार साल भर में करीब 3000 यूनिट बिजली खर्च करता है और इससे करीब साल भर में 1.58 टन कार्बन डाई ऑक्साइड वायुमंडल में जा रही है.

 

दोनों परिवारों की कारें कितना कार्बन धरती में उड़ेल रही हैं वो भी जान लीजिए.

 

अमेरिका के खुशालानी परिवार और नोएडा के शर्मा परिवार दोनों ही परिवारों में दो कारों का इस्तेमाल होता है. शर्मा परिवार के पास तो एक बाइक भी है.

 

शर्मा परिवार के पास जो छोटी कार है उससे 3.48 टन कार्बन डाई ऑक्साइड वायुमंडल में जा रही है, एक बड़ी कार है जिससे करीब 5.36 टन कार्बन डाई ऑक्साइड वायुमंडल में जा रही है. हालांकि अमेरिका में रहने वाला खुशालानी परिवार हाइब्रिड कार का इस्तेमाल करता है.

 

हाइब्रिड कारों अलग अलग ब्रैंड से प्रदूषण का स्तर अलग अलग है लेकिन ये स्तर पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के तय मानकों से कम हैं अगर हाइब्रिड कार की आम डीजल या पेट्रोल से चलने वाली कार से तुलना करें तो ये कारें प्रदूषण को 25 से 90 फीसद कम कर सकती हैं.

 

खुशालानी परिवार की हाइब्रिड कार हर साल 1.72 टन कार्बन डाई ऑक्साइड निकाल रही है. जबकि उनकी दूसरी कार 7.15 टन कार्बन डाई ऑक्साइड वायुमंडल में उड़ेल रही है.

 

भारत में ताजा खाना ज्यादा खाया जाता है लेकिन अमेरिका में पैकेज्ड फूड का चलन ज्यादा है इसलिए पैकेज्ड फूड की वजह से भी कार्बन डाई ऑक्साइड वायुमंडल में जाती है लेकिन इसके बावजूद खाने के मामले में अमेरिका का परिवार 1.16 टन कार्बन डाई ऑक्साइड निकालता है जबकि भारत का शर्मा परिवार 1.56 टन कार्बन डाई ऑक्साइड.

 

बिजली से लेकर कार तक और पैकेज्ड फूड से लेकर हवाई सफर तक सब कुछ जोड़कर अगर अमेरिका और भारत के इन दोनों परिवार की कार्बन डाई ऑक्साइड का हिसाब लगाया जाए तो नोएडा का रहने वाला पांच लोगों का शर्मा परिवार हर साल करीब 7.85 टन कार्बन डाई ऑक्साइड को वायुमंडल में भेज रहा है जबकि अमेरिका में रहने वाला पांच लोगों को खुशालानी परिवार करीब तीन गुना ज्यादा 21.96 टन कार्बन डाई ऑक्साइड वायुमंडल में भेज रहा है.

 

कार्बन निकालने के मामले में परिवार ही नहीं प्रति व्यक्ति के हिसाब से भी भारत का नंबर काफी नीचे आता है. लेकिन कुल कार्बन निकालने के मामले में दुनिया में भारत चौथे नंबर पर है.

 

मौजूदा वक्त में 26 फीसदी कार्बन छोड़ने वाला चीन पहले नंबर पर है. अमेरिका करीब 17 फीसदी कार्बन छोड़ता है. यूरोपीय यूनियन 13 फीसदी और 6.5 फीसदी कार्बन छोड़ने वाला भारत चौथे नंबर पर है.

 

तस्वीर आपके सामने है कि कौन धरती को कितना गर्म कर रहा है. धरती को गर्म कर रही कार्बन डाई ऑक्साइड को वायुमंडल में जाने से कैसे कम किया जाए इस पर फ्रांस की राजधानी पेरिस में 190 देश मिलकर चर्चा कर रहे हैं. लेकिन इस बार सिर्फ चर्चा से काम नहीं चलेगा क्योंकि धरती की बिगड़ती सूरत को अगर बचाना तो दुनिया को कुछ ठोस कदम उठाने होंगे.

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