क्या इस तरह की विदाई का हकदार था दुनिया का ये सबसे तेज़ खिलाड़ी उसेन बोल्ट?

क्या इस तरह की विदाई का हकदार था दुनिया का ये सबसे तेज़ खिलाड़ी उसेन बोल्ट?क्या इस तरह की विदाई का हकदार था दुनिया का ये सबसे तेज़ खिलाड़ी उसेन बोल्ट?

नई दिल्ली, मनोज झा। इतिहास ने तमाम महानताओं को समय के पहिये तले पिसते देखा है। शनिवार की रात पूरी दुनिया फिर ऐसे ही एक वाकये की प्रत्यक्षदर्शी बनी। हमने देखा, एक ताज को जमीन पर गिरते हुए, एक अजेय योद्धा को पराजित होते हुए, एक महान एथलीट को नौसिखिए की तरह चूकते हुए। और हां, यह सब कुछ इस एथलीट ने बेबस होकर अपनी आंखों के सामने देखा। वह लाचार था, दौड़ में उसकी बादशाहत छिन चुकी थी, वक्त पलटी मार चुका था। यह कारुणिक कहानी जमैका के महान धावक उसेन बोल्ट की है।

करीब दशक भर से ट्रैक एंड फील्ड के अजेय योद्धा और आठ ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता बोल्ट शनिवार की रात लंदन में अपने करियर की अंतिम दौड़ लगाने उतरे थे। मौका था, वर्ल्ड  एथलेटिक्स चैंपियनशिप का। इससे पहले अभी पिछले दिनों ही 100 मीटर की रेस हारने के बाद (बोल्ट तीसरे स्थान पर रहे थे) मानो समय ने संकेत दे दिया था कि उनके युग का अंत निकट आ चुका है। नई प्रतिभाओं ने उन्हें अपदस्थ कर दिया है। बोल्ट समय की इस उद्घोषणा को शायद सुन भी चुके थे। तभी तो उन्होंने एलान किया था कि शनिवार को 100 मीटर की रिले दौड़ के साथ ही वह ट्रैक को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह देंगे। यह उनकी आखिरी दौड़ होगी।

उनकी पिछली पराजय को भुलाकर बोल्ट के दीवानों को यही आस थी कि इस अंतिम दौड़ को जीतकर यह महानधावक अपने करिश्माई करियर का गरिमामय अंत करेगा। लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था। लंदन के खचाखच भरे स्टेडियम में उत्तेजना चरम पर थी। दौड़ शुरू होते ही तमाम निगाहें जमैका की टीम पर थी, क्योंकि बोल्ट इसी का हिस्सा थे।

बोल्ट की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मेजबान ब्रिटेन की टीम इस प्रतिस्पर्धा में भाग ले रही थी, लेकिन सैकड़ों अंग्रेज दर्शक हाथों में जमैका के इस महान धावक के समर्थन में प्लेकार्ड, तख्तियां और बैनर लहरा रहे थे। दर्शक सांस थामे रिले के आखिरी 100 मीटर की दौड़ का इंतजार कर रहे थे जिसमें बोल्ट को दौड़ लगानी थी। जमैका के तीसरे धावक ने चंद पलों की देरी से ही सही, बोल्ट के हाथ में रिले थमाई। और फिर चीते की फुर्ती से बोल्ट अपने ही अंदाज में फर्राटा भरने लगे। लेकिन यह क्या..! फिनिश लाइन से करीब 30 मीटर पहले उनके पैर में अचानक झटका (क्रैंप) लगता है। वह अटकते हैं, प्रतिद्वंद्वियों से पिछड़ते हैं, दर्द से बिलबिलाकर वहीं ट्रैक पर पहले घुटनों के बल और फिर हताश होकर औंधे मुंह गिर जाते हैं। बोल्ट की बेबसी का यह दृश्य दुनिया भर में उनके चाहने वालों की आंखें नम कर गया, कई लोग रोने लगे, शायद ख़ुद बोल्ट भी। इसलिए नहीं कि वह हार गए थे या फिसड्डी रहे थे। बल्कि इसलिए, क्योंकि फर्राटा दौड़ का यह बादशाह, जिसके डग की तुलना कभी चीते से की जाती थी, अपनी आखिरी दौड़ पूरी तक नहीं कर पाया।

दुनिया भर के खेलप्रेमियों ने न जाने कब से बोल्ट को हारते देखा नहीं था। और जब देखा तो वह विचित्र, भयानक और अकल्पनीय था। ट्रैक एंड फील्ड के इस महानतम एथलीट के करियर का अंत ऐसा तो नहीं होना था। इतिहास में योद्धाओं की शौर्यगाथाएं और उपलब्धियों के अनगिनत किस्से हैं, लेकिन महानताओं के कारुणिक अंत की कहानियां विरले हैं। बोल्ट के चाहने वालों का मलाल यही है कि शनिवार की रात लंदन की यह कहानी भी उन्हीं विरलों की जमात में शुमार हो गई है। अंग्रेजों ने फ्रांस की महान क्रांति के नायक और वहां के शासक नेपोलियन बोनापार्ट को वाटरलू की जंग में पराजित करने के बाद सेंट हेलेना के एकांत द्वीप में कैद कर दिया था। उनकी जिंदगी का बाकी समय वहां बेबसी और तन्हाई में बीता। शनिवार को बोल्ट ट्रैक पर जहां गिरे, गज, दो गज भर की वह जमीन उस वीराने टापू जैसी ही दिख रही थी। पूरा स्टेडियम कोलाहल में डूबा में था, लेकिन बोल्ट ट्रैक पर तन्हा और बेबस थे। और हां, यह शायद संयोग ही था कि इस मुकाबले के विजेता भी अंग्रेज (ब्रिटेन) ही रहे।

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Pradeep Sehgal 

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